Samastipur

आजादी का इतिहास:टुनटुनियां गुमटी से दलसिंहसराय तक कांप उठा था अंग्रेजी हुकूमत..

समस्तीपुर.आजादी के इतिहास की तेज लपटें बिहार के समस्तीपुर की धरती पर उठी थीं, जहां 1942 की अगस्त क्रांति ने अंग्रेजी साम्राज्य की नींद उड़ा दी थी। टुनटुनियां गुमटी पर टॉमीगनों की अंधाधुंध गोलियों से लेकर दलसिंहसराय थाने पर तिरंगा फहराने तक, समस्तीपुर का हर कोना उस दौर में विद्रोह, बलिदान और स्वाभिमान की गवाही देता रहा।

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यह वह इतिहास है, जिसके पन्ने आज भी शहादत की खुशबू से महकते हैं। 8-9 अगस्त 1942 की चिंगारी ने जिले को क्रांति का रणक्षेत्र बना दिया था।महात्मा गांधी के “भारत छोड़ो” और “करो या मरो” के आह्वान की खबर जैसे ही समस्तीपुर पहुंची, गांव-गांव में आजादी का शंखनाद गूंज उठा। छात्र, किसान, मजदूर और नौजवान घरों से निकल पड़े। रेलवे लाइनें उखाड़ी गईं, सरकारी प्रतिष्ठानों का विरोध हुआ और अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनसैलाब उमड़ पड़ा। दलसिंहसराय से समस्तीपुर, ताजपुर से सिंघिया तक हर ओर तिरंगा और इंकलाब की गूंज सुनाई देने लगी।

 

आंदोलन की पहली संगठित लहर दलसिंहसराय से उठी। 13 अगस्त 1942 को सीएच स्कूल के छात्रों ने दलसिंहसराय रेलवे स्टेशन पर तोड़फोड़ कर अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दी। कई छात्रों की गिरफ्तारी हुई तो अगले ही दिन हजारों युवाओं ने दलसिंहसराय थाने का घेराव कर दिया। इसी दौरान बनरवा गाछी (वर्तमान सरदारगंज) के पहलवान राम लखन झा और योगी झा भी आंदोलनकारियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो गए। घेराव के दौरान गोविंदपुर के परमेश्वरी महतो ने अवसर पाकर दलसिंहसराय थाने पर तिरंगा फहरा दिया। तिरंगे की यह शान अंग्रेजी हुकूमत को नागवार गुजरी। पुलिस ने बिना चेतावनी गोलियां चला दीं। मौके पर तीन क्रांतिकारी शहीद हो गए, जबकि आधा दर्जन से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। बाद में चार और घायल क्रांतिकारियों ने दम तोड़ दिया। इस गोलीकांड में परमेश्वरी महतो, उजियारपुर चैता के दुर्गा पोद्दार, बंगाली दुसाध, जागेश्वर लाल, सरयूग कापर, अनुप महतो समेत कई वीरों ने सर्वोच्च बलिदान दिया। एक शहीद की पहचान आज तक नहीं हो सकी।

 

इतिहास की अमर विरासत है समस्तीपुर की गाथा अगस्त 1942 की घटनाओं में 8 से 15 अगस्त तक गिरफ्तारी, लाठीचार्ज, प्रदर्शन और गोलीबारी का सिलसिला चलता रहा। 15 अगस्त 1942 को दर्ज कांड संख्या-9 में 73 लोगों को आरोपी बनाया गया। लेकिन अंग्रेजी दमन भी समस्तीपुर के हौसले को नहीं तोड़ सका।आज दलसिंहसराय के शहीदों के नाम शिलापट्टों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं और टुनटुनियां गुमटी की मिट्टी अब भी यह संदेश देती है कि आजादी कोई उपहार नहीं थी, बल्कि समस्तीपुर के अनगिनत वीरों के लहू से लिखी गई वह अमर गाथा है, जिसे हर पीढ़ी को गर्व के साथ पढ़ना और याद रखना चाहिए।सोर्स :दैनिक भास्कर।

Pargati Singh

न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।

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