खुशखबरी:जीआई टैग से चमकेगी टिकुली पेंटिंग: कारीगरों को मिलेगा वैश्विक बाजार
पटना.बिहार की पारंपरिक और विशिष्ट लोककला टिकुली पेंटिंग अब वैश्विक पहचान की दहलीज पर है। इसे भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) जल्द मिलेगा। बिहार म्यूजियम सोसायटी ने इसके लिए विधिवत आवेदन कर दिया है। आवेदन पर अब तक दो बार क्वेरी आई और सभी ज़रूरी दस्तावेजों के साथ जवाब दे दिया गया है।
उम्मीद है कि मार्च 2026 तक टिकुली पेंटिंग को जीआई टैग मिल जाएगा। इस कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलेगी और कारीगरों के लिए रोजगार, बाजार और बेहतर कीमत के नए अवसर खुलेंगे। कलाकारों और कला प्रेमियों की नज़र मार्च 2026 पर टिकी है।
रोजगार, बाजार व बेहतर कीमत का नया अवसर
क्या होगा फायदा…
टिकुली पेंटिंग को वैश्विक मान्यता मिलेगी।
हजारों कारीगर परिवारों को स्थायी काम मिलेगा।
कलाकारों को अपनी कला की उचित कीमत मिलेगी।
देश-विदेश में मांग और लोकप्रियता बढ़ेगी।
पारंपरिक कला की मौलिकता सुरक्षित रहेगी।
टिकुली कला किस उद्देश्य से शुरू हुई? बिंदी बनाने वाले कलाकारों ने रोजगार को बढ़ाने के लिए शुरुआत की।
टिकुली का ऐतिहासिक काल किससे जुड़ता है? मौर्य काल से इसके प्रमाण मिलते हैं।
मुगल काल में इसका प्रमुख केंद्र कहाँ था? पटना सिटी टिकुली का बड़ा केंद्र था।
टिकुली पेंटिंग का आधुनिक रूप कब बना? 1950 के बाद नवाचार से नया रूप बना और नया बाजार विकसित हुआ।
आज टिकुली पेंटिंग किस माध्यम पर बनती है? मुख्य रूप से एमडीएफ बोर्ड पर बनती है।
माथे की बिंदिया और टिकुली पेंटिंग दो अलग कलाएँ हैं। 1954 में उपेंद्र महारथी के जापान दौरे के बाद टिकुली पेंटिंग में बड़ा बदलाव आया। कांच से हटकर लकड़ी, हार्ड बोर्ड और फिर एमडीएफ बोर्ड पर यह कला विकसित हुई।- अशोक कुमार विश्वास, वरिष्ठ कलाकार (पद्मश्री से सम्मानित)
न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।
