Patna

महंत रामसुमिरन दास जी की अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब:काशी में होगा अंतिम संस्कार

समस्तीपुर।गीता धाम फतेहा के महंत, सिमरिया कुंभ तदर्थ सेवा समिति के अध्यक्ष और महामंडलेश्वर श्री श्री 108 राम सुमिरन दास जी के निधन के बाद आज उनकी अंतिम यात्रा में जन सैलाब उमड़ पड़ा। 80 वर्षीय राम सुमिरन दास जी का निधन रविवार को अचानक हृदयाघात से हो गया था। इसके बाद से ही उनके अंतिम दर्शन के लिए भीड़ उमड़ पड़ी थी।

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बिहार सरकार के मंत्री सुरेंद्र मेहता, तेघड़ा विधायक रजनीश कुमार, युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष शिव प्रकाश गरीबदास, बेगूसराय के पूर्व मेयर संजय कुमार सहित उनके हजारों अनुयाई अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़े थे। रविवार से जारी अंतिम दर्शन के बाद आज उनकी अंतिम यात्रा गीता धाम फतेहा से निकाली गई, जिसमें हर उम्र के हजारों लोगों की भीड़ जुटी।बैंड बाजा के साथ निकली अंतिम यात्रा में कहीं रामधुन हो रहा था तो कहीं विदाई के गीत बज रहे थे। पार्थिव शरीर के आगे पीछे हजारों की संख्या में महिला, पुरुष, बच्चे, बुजुर्ग चल रहे थे। गीता धाम फतेहा से निकली अंतिम यात्रा मुरली टोल, समसीपुर, भुथरी गंगासागर, रचियाही होते हुए शेरपुर ठाकुरबाड़ी पहुंची।

 

जहां उपस्थित हजारों लोगों ने अंतिम दर्शन किए। उसके बाद शेरपुर ठाकुरबाड़ी से अंतिम यात्रा वापस गीता धाम फतेहा पहुंची। 20 किलोमीटर की अंतिम यात्रा में हर कोई राम सुमिरन दास जी की एक झलक पाना चाहता था। संत परंपरा के अनुसार उन्हें अर्थी पर लिटाया नहीं गया था। बल्कि महंत की तरह गद्दी बनाकर बैठाया गया था, जिससे कि सभी लोग एक झलक पा सकें।

काशी में पार्थिव शरीर का होगा अंतिम संस्कार

 

फतेहा में कुछ देर विश्राम के बाद पार्थिव शरीर को काशी ले जाया गया है, जहां अंतिम संस्कार किया जाएगा। सनातन संत परंपरा के अनुसार संत महंत के पार्थिव शरीर को जलाने के बदले समाधि दे दी जाती है या गंगा में विसर्जित किया कर दिया जाता है‌। लेकिन राम सुमिरन दास जी ने अंतिम समय में इच्छा जताई थी कि उनके पार्थिव शरीर को दफनाया या विसर्जित नहीं किया जाए।बल्कि विश्व स्तर पर मोक्ष नगरी के रूप में चर्चित काशी विश्वनाथ में अंतिम संस्कार किया जाए। उल्लेखनीय है कि राम सिमरन दास जी का जन्म साहेबपुर कमाल के पचवीर में हुआ था। लेकिन 12 वर्ष की उम्र में ही यह फतेहा ठाकुरबाड़ी चले आए और यहां तत्कालीन महंत रामरतन दास के सानिध्य में रहने लगे। 1977 में राम रतन दास जी के निधन के दौरान राम सुमिरन दास की उम्र 18 वर्ष थी। उस समय ही उन्हें फतेहा ठाकुरबाड़ी का महंत बना दिया गया।

 

महंत बनने के बाद उन्होंने ठाकुरबाड़ी को भव्य और दिव्य रूप देते हुए गीता धाम के रूप में देश में प्रतिष्ठित कर दिया। इस दौरान उनके देश से लेकर विदेश तक हजारों शिष्य बने और गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बड़ी संख्या में लोगों की भी उमड़ती है। राम सुमिरन दास गीता धाम फतेहा तक ही सीमित नहीं रहे।बल्कि बिहार के विभिन्न जिलों, अयोध्या और चित्रकूट सहित उत्तर प्रदेश में कई अन्य जगह, झारखंड एवं मध्य प्रदेश तक 50 से अधिक मठ-मंदिरों का निर्माण कराया। सिमरिया में लगने वाले कार्तिक कल्पवास मेला में भी उनकी सहभागिता रहती थी। सिमरिया में गंगा तट पर जब कुंभ की शुरुआत हुई तो इन्हें कुंभ तदर्थ सेवा समिति का अध्यक्ष बनाया गया। इन्होंने देश भर के संत-महात्माओं के साथ समन्वय यहां कुंभ और अर्ध कुंभ को भव्य रूप प्रदान किया।

 

2011 में अर्धकुंभ के दौरान उन्हें महामंडलेश्वर की उपाधि मिली

 

2011 में अर्धकुंभ के दौरान उन्हें महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई। तभी तो रविवार को ज्यों ही उनके निधन की जानकारी मिली कि ना सिर्फ बेगूसराय बल्कि बिहार के विभिन्न हिस्सों से लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए उमड़ पड़े। 20 किलोमीटर की पैदल अंतिम यात्रा में सूजा के महंत शंकर दास सहित कई अन्य लोग लगातार कंधा देते रहे।स्थानीय प्रभाकर राय बताते हैं कि जिस तरह से राम के वनगमन को निकलते वक्त नर नारी, पशु पक्षी, नदी नाहर, पेड़ पौधे सभी रो रहे थे, सरयू उदास होकर थम गई थी। भगवान राम के साथ-साथ सारे अयोध्यावासी वनगमन को हठ पर अड़े थे। ठीक उसी तरह भीषण ठंड के बावजूद क्षेत्र के श्रद्धालु बाबा रामसुमिरन दास जी के पार्थिव शरीर के साथ उनका जयकारा लगाते हुए निकल पड़े थे।

 

मना करने पर मान नहीं रहे, रोते- बिलखते हुए बस बाबा रामसुमिरन दास के गुणों की बखान करते रहे, जयकार करते रहे। पार्थिव शरीर भ्रमण में हजारों नर-नारी बेसुध होकर पीछे रोते बिलखते चल रहे थे। किसी व्यक्ति के निधन पर उसके परिवार के लोग रोते हैं। लेकिन धर्मात्मा, त्यागी का निधन हुआ तो पूरा समाज, हजारों नर-नारी रो रहे थे।

 

फतेहा से करीब 2 किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित समसीपुर गांव में गंगावासी मंदिर का निर्माण बाबा के द्वारा करवाया गया है। जिसकी कलश यात्रा 8 जनवरी को होनी थी और बाबा रामसुमिरन दास जी इसी की बेहतर तैयारी और देखरेख के लिए वहां स्वयं कई दिनों से प्रवास पर थे। जहां हृदयघात होने पर इलाज के लिए बेगूसराय ले जाने के दौरान परलोकगमन हुआ।आज के इस भौतिकतावादी युग में जब मठाधीशों पर तमाम तरह की नकारात्मक बातें सुनने को मिलती हैं, ऐसे में बाबा रामसुमिरन दास भक्ति भाव के, साधना के, परोपकारी, समाजोपयोगी कार्यों के प्रति समर्पित महान संत का उदाहरण के रूप में हमेशा जीवंत रहेंगे। बाबा ने छोटी जगह और कम संसाधनों को अपनी इच्छाशक्ति के मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया। उन्होंने व्यक्तिगत सुख सुविधा का कभी ख्याल नहीं रखा।

 

भगवान के प्रति जीवन समर्पित किया और धर्म जागरण को अपना पहला धर्म समझा। लगातार अपने सतत प्रयासों से देश के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों भव्य मंदिर बनवाए। यही वजह है कि उनके अनुयायी पूरे भारत में हैं। उनका सबसे बड़ा सपना गीताधाम के रूप में साकार हुआ। यह फतेहा में अवस्थित गीताधाम देश का दूसरा सबसे बड़ा गीताधाम है, जिसकी दीवारों पर गीता का सारा श्लोक अंकित है।

Pargati Singh

न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।

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