अरावली बचाओ, हिमालय बचाओ’अभियान : समस्तीपुर में निकाला विरोध मार्च
समस्तीपुर में भाकपा माले की अपील पर आज ‘अरावली बचाओ – हिमालय बचाओ’, ‘पर्यावरण बचाओ – भारत बचाओ’ अभियान का आयोजन किया गया। इस दौरान भाकपा-माले के कार्यकर्ताओं ने समस्तीपुर शहर समेत जिले के विभिन्न प्रखंड में प्रतिरोध मार्च निकाला।
शहर के माल गोदाम चौक स्थित माले कार्यालय से निकला प्रतिरोध मार्च शहर के विभिन्न मार्गों का भ्रमण करते हुए स्टेशन चौराहा पहुंची, जहां पर एक सभा का आयोजन किया गया। आयोजित सभा को संबोधित करते हुए मलिक के जिला सचिव प्रोफेसर उमेश कुमार ने कहा कि आज हिमालय की ऐसी छोटी जो 100 मीटर ऊंची और करीब 600 वर्ग स्क्वायर फीट में फैली हुई है, उसे अरावली कहा जाता है।
उमेश कुमार ने कहा कि इन पर्वत श्रृंखला में इन दोनों खनिज संपदाओं की खोज के लिए खुदाई की जा रही है जिससे पर्यावरण पर खतरा उत्पन्न हो गया है। पर्यावरण को बचाने के उद्देश्य से भाकपा माले ने पूरे देश में आज अरावली और पर्वत श्रृंखलाओं को बचाने के लिए प्रतिरोध मार्च निकाला है।उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य है कि हम देश के भविष्य को सुरक्षित रख सके और आने वाली पीढ़ी को स्वच्छ भारत दें सके। इस मौके पर भाकपा माले के नेता ललन कुमार ने कहा कि केन्द्र सरकार की गलत नीति के कारण जल, जंगल, जमीन, और अब पर्वत श्रृंखलाओं पर भी पूंजीपतियों का कब्जा होते जा रहा है।
प्रतिरोध मार्च को संबोधित करते हुए भाकपा माले जिला स्थायी समिति सदस्य महावीर पोद्दार ने कहा कि केंद्र सरकार रेलवे, हवाई अड्डा, कल कारखाने, बैंक, बीमा, एलआईसी, जमीन अपने पूंजीपति दोस्तो के हाथों बेचने के बाद अब गुजरात, राजस्थान और दिल्ली स्थित अरावली पर्वत श्रृंखला को भी बेच दिया है।
स्टेशन चौराहे पर की सभा
उन्होंने कहा कि यह अरावली पर्वत श्रृंखला को बेचकर मोदी सरकार न सिर्फ आपदाओं को आमंत्रित कर रही है बल्कि भारत के भविष्य के सामने विनाशकारी नीतियों का गवाह भी बन गया है।भाकपा माले जिला स्थायी समिति सदस्य फूलबाबू सिंह ने कहा कि मोदी सरकार ने दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली पर्वतमाला को बेचकर भारत के जन जीवन पर गहरा संकट पैदा कर दिया है। उन्होंने कहा कि अरावली का 90% हिस्सा पर खनन माफिया ने कब्जा कर लिया है। उन्होंने कहा कि यह खतरा सिर्फ अरावली तक सीमित नहीं है बल्कि देश भर में फैल रही लूट, दोहन और पर्यावरणीय विनाश की बड़ी साजिश का हिस्सा है।
क्या है अरावली विवाद
सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की समिति की सिफारिश स्वीकार की, जिसमें 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली के रूप में मान्यता देने की बात कही गई। इससे पहले 1985 से चले आ रहे गोदावर्मन और एमसी मेहता मामले में अरावली को व्यापक संरक्षण मिला हुआ था।
नए फैसले के बाद राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। पर्यावरण कार्यकर्ता इसे इकोलॉजिकल आपदा बता रहे हैं। पर्यावरणविदों और विपक्षी दलों के नेताओं ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए।पर्यावरणविदों का तर्क है कि अरावली रेंज में 100 मीटर से छोटी पहाड़ियों में खनन की मंजूरी मिलने से इन पर्वतमालाओं के अस्तित्व खत्म होने का खतरा पैदा हो गया है। वहीं, केंद्र का कहना है कि यह गलतफहमी है और संरक्षण बरकरार रहेगा।
न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।
