Begusarai

कारगिल:खाना खा रहे थे जवान, पाकिस्तान ने किया था हमला’:कैप्टन बोले- दुश्मनों को..

बेगूसराय के भवेश कुमार और कैप्टन रामकृष्ण पाठक ने 1999 में हुए कारगिल की लड़ाई में पाकिस्तान को हराया था। ये कहते है कि गोलियों की बौछार हो या तोप के बरस रहे गोले हो, भारत मां के वीर सपूत जब राष्ट्र की रक्षा के लिए वर्दी पहन लेते हैं ,तो उनका एक ही लक्ष्य होता है। वो दुश्मनों का खात्मा है। तभी तो ऊंचाई वाले कारगिल जैसी अन्य चोटी पर कब्जा कर बैठे पाकिस्तानियों को हम सब ने मिलकर धूल चटाया और कारगिल फतह किया।

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ये हर भारतीय के लिए गर्व की बात है‌‌। भवेश कुमार ने अपने अनुभवों को साझा किया। जिसमें उन्होंने कारगिल की दुर्गम परिस्थितियों और भारतीय सेना के अदम्य साहस का आंखों देखा हाल बयां किया। वह कहते हैं कि वह समय बहुत कठिन था, ऊंचाई पर होने के कारण दुश्मनों को फायदा था, लेकिन हमारे जवानों का हौसला आसमान से भी ऊंचा था।

 

हर जवान सिर्फ भारत माता की जय और दुश्मनों को खदेड़ने का संकल्प लिए हुए था। बर्फीले पहाड़ों पर शून्य से भी नीचे के तापमान में भारतीय सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों को मुंहतोड़ जवाब दिया। गोलीबारी लगातार चल रही थी, हम जानते थे कि यह हमारे अस्तित्व की लड़ाई है। हमें अपने देश और अपने लोगों की रक्षा करनी थी।

 

विपरीत परिस्थितियों में सैनिकों ने हार नहीं मानी

 

विषम मौसम और विपरीत परिस्थितियों में भी सैनिकों ने हार नहीं मानी। रसद और गोला-बारूद पहुंचाना भी एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन हर बाधा को पार करते हुए जवान आगे बढ़ते रहे। हमने अपने कई साथी खोए, लेकिन उनकी शहादत बेकार नहीं गई। उनकी कुर्बानियों ने हमें और मजबूत बनाया और हमने दुश्मन को उसकी औकात दिखा दी।

 

उन्होंने बताया कि 1976 जन्म हुआ था, पढ़ने के दौरान भारत-पाकिस्तान युद्ध की कहानी सुनते थे। देश सेवा का जज्बा देखते सुनते थे, तभी से मन में देशभक्ति का जुनून जगने लगा और 20 साल की उम्र में 1996 में अपने को राष्ट्र की सेवा में समर्पित किया। 1998 में शादी हुई और शादी के बाद अपने ड्यूटी पर चला गया।

 

मैं सेना के सिग्नल कोर में था, 1999 जब कारगिल की लड़ाई शुरू हुई, तो बरेली में पोस्टेड था। जहां से कश्मीर भेजा गया, बेल्ट और वर्दी पहनने के बाद कभी डर नहीं लगा। मन में एक ही जोश और जज्बा था कि दुश्मनों के दांत खट्टे करना है। जब अपने काफिले के साथ बनिहाल ट्रांजिट कैंप की ओर बढ़ रहा था, तो रास्ते में पाकिस्तानियों ने हमला कर दिया।

 

ब्लास्ट में एक गाड़ी उड़ गई थी

 

ब्लास्ट में एक गाड़ी उड़ गई थी। ये पुलवामा हमला की तरह ही था। देखते ही देखते शहीदों की लाशें बिछ गई, कई जानें गई। लेकिन हम सब पीछे नहीं हटे और लगातार आगे बढ़ते गए। दुश्मनों ने पहाड़ी की ऊंची चोटी पर कब्जा कर लिया था। हम लोग रात में ही आगे बढ़ते थे, सुबह होते ही जहां पहुंचे वहीं रुक जाना था, अपने को सुरक्षित कर लेना था।हथियार से अधिक नाइट विजन डिवाइस कारगर होते थे। दो महीने जब तक कारगिल की लड़ाई चलती रही, कोई जवान सोते नहीं थे। बहुत थकने पर लेटते थे, नींद कोशिश करती थी आने की, लेकिन गोलियों की तड़तड़ाहट और तोपों के धमाके सोने नहीं देते थे। जब कभी धमाके होते थे तो मन कांप उठता था, कहीं मेरे साथी चपेट में ना आ गए हों।

 

जब खाने के लिए लाइन में लगते थे तो उसी समय पहाड़ की चोटी पर बैठे पाकिस्तानी हमला करते थे, गोलियों की तड़तड़ाहट होती थी, गोला गिरता था। हम सब दुश्मन ही नहीं नेचर से भी लड़ते थे, माइनस में तापमान रहता था। घर के लोग भले ही डरते थे, लेकिन हम लोगों को कभी डर नहीं लगा।

 

भारत माता का तिरंगा लहराया

 

नई-नई शादी हुई थी, जब ड्यूटी पर जा रहे थे तो किसी ने रोका नहीं और हम अपने लक्ष्य की ओर बढ़े। पाकिस्तानियों के छक्के छुड़ाकर भारत माता का तिरंगा लहरा दिया, आज का यह दिन हम सबके लिए गर्व का दिन है। भवेश की बातें बताता है कि हमारी स्वतंत्रता और संप्रभुता के लिए कितना बड़ा बलिदान दिया गया है।कैप्टन रामकृष्ण पाठक कारगिल युद्ध के अनुभव को अविस्मरणीय बताते हुए कहते हैं कि युद्ध के दौरान सोचने का कोई अवसर नहीं था। उन्हें और उनकी बटालियन को जहां भी आगे बढ़ने का आदेश मिलता था, वे बिना किसी सोच-विचार के तुरंत वहां पहुंच जाते थे। उनका लक्ष्य उनके सामने खड़ा है, तो उस पर विजय हासिल करना ही उनकी एकमात्र सोच थी।

 

उस समय बहुत सी ऐसी घटनाएं हुई थी, जिनका वर्णन करना मुश्किल है। उनके लिए सभी घटनाएं एक जैसी और सभी संवेदनशील थी। जब कोई सैनिक शहीद होता था तो उनका खून खौलता था। सैनिक के शरीर से खून की एक बूंद भी जब उन्हें या जवानों को दिखती थी तो मन विचलित हो उठता था और कुछ कर गुजरने की तमन्ना होती थी।

 

घर वालों से कोई संपर्क नहीं हो पाता था

 

युद्ध के हालातों में किसी भी तरह की चिट्ठी-पत्री या कम्युनिकेशन संभव नहीं था, सब कुछ बंद था। जब तक माहौल शांत नहीं हुआ और स्थिति में कुछ नरमी नहीं आई, तब तक घर वालों से कोई संपर्क नहीं हो पाता था। घर वाले देश में चल रही गतिविधियों और कारगिल युद्ध से संबंधित खबरों को देखकर ही चिंतित रहते थे कि उनका बेटा भी युद्ध में है।जवान का काम सिर्फ अपने लक्ष्य को देखते हुए आगे बढ़ना है, बाकी काम सरकार का है, चाहे वह भोजन हो, रसद हो, गोला-बारूद हो या अन्य कोई सामग्री हो। तैयार भोजन भी हेलिकॉप्टर से गिराया जाता था, जिसे सिर्फ पैकेट खोलकर गर्म पानी में डालकर खाना होता था। जवानों को सोचने का फुर्सत नहीं था। भारतीय सशस्त्र सेना और लड़ाकू सेना का काम सिर्फ लड़ाई लड़ना और अपने लक्ष्य को फतह करना है।

Pargati Singh

न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।

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