दलसिंहसराय में 25 पुरानी पांडुलिपी खोजी:DEO की मदद से पोर्टल पर अपलोड
दलसिंहसराय में ज्ञान भारतम् मिशन के तहत पांडुलिपियों के डिजिटाइजेशन का अभियान शुरू किया गया है। डीएम रोशन कुशवाहा के नेतृत्व में चल रहे इस अभियान ने अब तक एक महत्वपूर्ण मुकाम हासिल कर की है। इसी क्रम में दलसिंहसराय में चलाए गए विशेष सर्वेक्षण अभियान के दौरान वार्ड संख्या 12 निवासी जितेंद्र राउत ने अपने स्तर पर खोज कर 25 प्राचीन हस्तलिखित पांडुलिपियां सामने लाईं।
इन पांडुलिपियों को प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी प्रभात रंजन के समन्वय से ज्ञान भारतम् पोर्टल पर सफलतापूर्वक अपलोड किया गया है। इसके अलावा दलसिंहसराय स्थित पांडव मंदिर सहित अन्य मंदिरों और मठों से भी 30 से अधिक पांडुलिपियां हासिल की गईं। इस प्रकार जिले में अब तक कुल 77 पांडुलिपियों का डिजिटाइजेशन पूरा हो चुका है, जो सांस्कृतिक संरक्षण की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है.डीएम ने इस पहल की सराहना करते हुए जितेंद्र राउत व बीईओ दलसिंहसराय को सम्मानित किया। कार्यक्रम में कला संस्कृति पदाधिकारी जूही कुमारी भी उपस्थित रहीं और पूरे अभियान के संचालन में सक्रिय भूमिका निभाई। अब इन पांडुलिपियों को वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकेगा। शोध करने वाले छात्रों को भी आसानी होगी।
डीएम का लोगों से आह्वान
डीएम रोशन कुशवाहा ने आम नागरिकों से अपील की है कि वे अपने घरों, मंदिरों और मठों में सुरक्षित रखी 75 साल या उससे अधिक पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियों की पहचान कर उन्हें सामने लाएं, ताकि इस विरासत को डिजिटल रूप में सहेजा जा सके। यह पहल न सिर्फ इतिहास को संरक्षित करने की दिशा में एक मजबूत कदम है, बल्कि समस्तीपुर को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और जागरूक बनाने का भी प्रयास है। पांडुलिपियों के डिजिलाइजेंशन से आने वाली पिढी अपनी विरासत को आसानी से समझ सकेंगे।
पांडुलिपि एक हस्तलिखित ग्रंथ है, जिसका महत्व भारतीय ज्ञान और संस्कृति के संरक्षण में है। इसे हस्तलिखित ग्रंथ, हस्तलेख या हस्तलिपि भी कहा जाता है। पांडुलिपि का मूल अर्थ है “हाथ से लिखी गई किसी रचना का प्रारूप”। यह शब्द संस्कृत के “पाण्डु” (पीला या सफेद) और “लिपि” (लेखन) से मिलकर बना है.पांडुलिपियां भारतीय ज्ञान की प्राचीन परंपरा का संरक्षण करती हैं। वेदों से लेकर पञ्चतंत्र की कहानियों तक, ये ग्रंथ हजारों साल से संचित और संरक्षित ज्ञान का प्रतिनिधित्व करते हैं। पांडुलिपियों का इतिहास भारतीय संस्कृति और सभ्यता का इतिहास है। ये ग्रंथ न केवल धार्मिक और दार्शनिक विचारों को संजोते हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को भी दर्शाते हैं।
पांडुलिपियों का अध्ययन विद्वानों के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये प्राचीन ज्ञान और विचारधाराओं को समझने में मदद करती हैं। कई पांडुलिपियाँ आज भी शोध का विषय बनी हुई हैं।
न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।
