46 सालों में नहीं मिली मोरवा प्रखंड के एकमात्र संस्कृत महाविद्यालय को मान्यता
समस्तीपुर।मोरवा जिस भाषा की संस्कृति और विरासत को बचाने के लिए 46 साल पहले कोशिश की गई थी वह आज भी धूल फांकता नजर आ रहा है।उपशास्त्री और शास्त्री की परीक्षा लेने के लिए सम्बद्धता तो मिली लेकिन मानता नहीं मिला। 46 साल बीत जाने के बाद भी इसकी बदहाली कम नहीं हुई । आज यह महाविद्यालय अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। भवन के जर्जर होने की वजह से न तो विद्यालय में बच्चे आते हैं और न ही शिक्षक ।संसाधनों का घोर अभाव है। विभागीय उपेक्षा का यह शिकार हुआ यह संस्कृत महाविद्यालय अपनी विरासत को बचाने में कामयाब नहीं हो रहा है। मामला प्रखंड के एकमात्र संस्कृत महाविद्यालय से जुड़ा है। बताया जाता है कि साल 1980 में ऐतिहासिक खुदनेश्वर धाम परिसर में इसकी स्थापना हुई थी।
विश्वनाथ संस्कृत महाविद्यालय की नाम से चल रहे इस महाविद्यालय के जीर्णोद्धार को लेकर कई बार डपोरशंखी घोषणाएं की गई। 2019 में कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय दरभंगा से परीक्षा को इसकी सम्बद्धता मिली। कुछ बच्चे यहां से उत्पन्न होकर निकले तो अधिकांश शिक्षक सेवानिवृत हो गए लेकिन उन्हें कोई लाभ नहीं मिला। विभागीय अधिकारियों के द्वारा निरीक्षण किया गया ।स्थानीय सांसद और विधायक के द्वारा लंबे-लंबे आश्वासन दिए गए लेकिन इसकी बदहाली कम नहीं हुई। यह महाविद्यालय आज पूरी तरह जर्जर हो चुका है।
नतीजा है कि अब इसकी अस्तित्व पर संकट है ।क्योंकि बच्चों की संख्या नगण्य है। व्यवस्था शून्य है।ऐसे में महाविद्यालय को बचा पाने की जिम्मेदारी उठाने वाले प्रशासन के लोग इस तरफ ध्यान दें इसके लिए स्थानीय लोग आवाज उठा रहे हैं ।इस बाबत मंदिर प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष इंद्रदेव शर्मा के द्वारा बताया गया कि बार-बार इसकी बदहाली को लेकर अधिकारियों को ध्यान आकर्षित कराया गया लेकिन अधिकारियों ने इस तरफ ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा और आज यह विद्यालय अपने बदहाली पर आंसू बहाने को विवश है।
न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।
