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“दिव्यांग कोटि,बिहार के 44 व बाकी राज्यों के 121 लोग बने प्राइमरी शिक्षक,आरटीआई के तहत BPSC ने दी जानकारी

मुजफ्फरपुर.बिहार के दिव्यांग युवाओं की राह में “सिस्टम’ रोड़ा बन रहा है। बिहार लोक सेवा आयोग (बीपीएससी) की आेर से आयोजित तीसरे चरण की शिक्षक नियुक्ति परीक्षा में वर्ग 1 से 5 के लिए राज्य के 800 दिव्यांग अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था। इसमें सिर्फ 44 का ही चयन हुआ है। वहीं, अन्य राज्यों के 538 दिव्यांग अभ्यर्थी थे, जिसमें 121 सफल हुए हैं।

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खास बात यह है कि दिव्यांग कोटि में शिक्षक बने अन्य राज्य के अभ्यर्थियों में सबसे अधिक 115 उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इसके अलावा मध्य प्रदेश के 4 और पश्चिम बंगाल व राजस्थान के 1-1 अभ्यर्थी शिक्षक बने हैं। आरटीआई के तहत बीपीएससी ने टीआरई-3.0 में वर्ग 1 से 5 के लिए दिव्यांग कोटि के ऑर्थोपेडिक हैंडिकैंप्ड का आंकड़ा दिया है। इसमें बताया है कि 1338 ऑर्थोपेडिक हैंडीकैप्ड ने आवेदन किया था, जिसमें 165 का चयन हुआ है। दिव्यांगता की अन्य कैटेगरी में भी इसी तरह की अनियमितता की आशंका जताई जा रही है। इसके साथ ही मध्य, माध्यमिक आैर उच्च माध्यमिक के लिए हुई नियुक्ति में भी ऐसी अनियमितता के आरोप लग रहे हैं। किसी भी आरक्षण का लाभ केवल बिहार के ही अभ्यर्थियों को मिलना था। बिहार के महज 26% अभ्यर्थी हैं, जबकि बाहरी राज्य के कुल 74% अभ्यर्थियों का चयन हुआ है। बिहार से अधिक आवेदन होने के बाद भी कम चयन हुआ है।

दूसरे राज्य के अभ्यर्थियों को नहीं मिलना था आरक्षण

आरटीआई एक्टिविस्ट हरे कृष्ण प्रकाश का कहना है कि विज्ञापन के अनुसार, दिव्यांग कोटि में बिहार के ही दिव्यांग अभ्यर्थियों का चयन होना था। लेकिन, बिहार के केवल 44 अभ्यर्थी हैं। 121 अभ्यर्थी दूसरे राज्य के चयनित हुए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को अविलंब इस पर संज्ञान लेना चाहिए, अन्यथा बिहार के दिव्यांग अभ्यर्थियों का हक कोई और ले जाएगा। सोशल एक्टिविस्ट शिवम प्रियदर्शी का कहना है कि टीआरई-1.0 से 3.0 तक आयोग ने काफी लापरवाही बरती है। आरक्षित सीट पर भी अन्य राज्य के महिला, पुरुष और दिव्यांग का रिजल्ट देकर बिहार के आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों के साथ अन्याय किया गया है।

Kunal Gupta

9 साल का पत्रकारिता का अनुभव।प्रभात खबर में कार्यरत, साथ ही बिहार न्यूज tv, आज अख़बार, दैनिक भास्कर में कार्य का अनुभव।कंटेट राइटर, एडिटिंग का कार्य,पत्रकारिता की हर विधा को सीखने की लगन।

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