बनारपुर के दो युवक दुबई में फंसे:खाड़ी में युद्ध के तनाव की चिंता
बक्सर.खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव, खासकर इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष, अचानक हजारों किलोमीटर दूर बसे बक्सर के बनारपुर गांव की जिंदगी में डर और सन्नाटा घोल गया है। गांव के दो युवक सुजीत सिंह और संतोष कुशवाह दुबई में काम करते हैं। वहां मिसाइल गिरने और संघर्ष तेज होने की खबरों ने उनके परिवारों की नींद उड़ा दी है।
होली का त्योहार बीत गया, लेकिन गांव के घरों में न रंग खरीदा गया और न ही किसी भी घर से पकवान की महक उठी। हर कोई सिर्फ एक ही बात कर रहा है, हमरा बेटा कब वापस आई?
काम छोड़कर घर दौड़े पिता
भास्कर की टीम होली के दिन बनारपुर गांव पहुंची। खेतों वाली पगडंडी के किनारे सुजीत कुशवाह की मां पन्ना देवी हाथ में हंसुआ लिए सरसों के खेत की ओर जा रही थीं। होली के रंग से दूर चेहरे पर चिंता की गहरी लकीरें साफ दिख रहीं थीं।उन्होंने कहा, जब से हमलोगों को पता चला है वहां लड़ाई हो रही है, तब से हमारी नींद उड़ गई है। वे इतना कहती हैं और फिर चुप हो जाती हैं। उनकी आंखें बार-बार भर आती हैं।
उधर, सुजीत के पिता रामप्रवेश सिंह लगभग दो किलोमीटर दूर राजमिस्त्री का काम कर रहे थे। जब किसी ग्रामीण ने उन्हें बताया कि उनके बेटे के बारे में पूछने मीडिया पहुंची है, तो वे फावड़ा छोड़कर भागते हुए घर लौट आए।घर पहुंचते ही पूछने लगे, बाबू, वहां का नया-नया खबर बताइए। हमरा सुजीत ठीक तो है ना?
बेटा मां को घबराहट न हो इसलिए बहुत कुछ छुपाता है
पन्ना देवी बताती हैं, मेरा बेटा जनता है कि हम जल्दी घबरा जाते हैं। इसलिए बहुत कुछ हमसे छुपाता है। बस कहता है मां चिंता मत करिए, मैं ठीक हूं। लेकिन मां का मन कैसे शांत हो?वह खेत के किनारे बैठती हैं और बोलीं, जब तक मेरा बेटा घर वापस नहीं आ जाएगा, तब तक हमारे घर का रंग पूरी तरह से फीका है। मन बस उसका मुंह देखना चाहता है। जिस भी दिन वो घर लौटेगा तब हमलोग होली मनाएंगे।
28 अगस्त 2025 को घर की गरीबी दूर करने गया था सुजीत
सुजीत के पिता रामप्रवेश सिंह बताते हैं, उनका बेटा पिछले साल 28 अगस्त को दुबई गया था। घर में आमदनी बहुत कम थी। मां-बाप खेती और छोटे-मोटे मजदूरी से घर चलाते हैं।वे कहते हैं, हम चाहत रहे कि सुजीत कुछ बचत करे, घर बने, बहन की शादी हो जाए। उसी खातिर विदेश गया था। लेकिन अब, हर मिसाइल हमले की खबर पर परिवार की धड़कनें तेज हो जाती हैं।
कैंप से 2 किलोमीटर पर मिसाइल गिरी, कैसे न डरें?
सुजीत के पिता बताते हुए भावुक हो जाते हैं, बेटा कह रहा था कि मिसाइल उधर गिरा है, जहां से उसका कैंप बस दो किलोमीटर दूर है। वो हमको समझा रहा है कि आप लोग चिंता मत करो। लेकिन बाप का दिल कहां मानता है?उन्होंने आसमान की ओर देखते हुए कहा, बस एक दुआ है… जैसे गया है वैसे ही सुरक्षित लौट आए।
जो सबका गति, वही हमारो
बनारपुर का दूसरा युवक संतोष कुशवाह भी दुबई में काम करता है। उसके पिता नन्दलाल सिंह की आंखें नम हो जाती हैं जब वे बेटे की बात करते हैं। वे बताते हैं, बेटा मुझे कहा था कैंप से दो किलोमीटर पर बम गिरा है। हम कहनी कि बेटा, लौट आओ… तो कहता है अभी आने की कोई व्यवस्था नहीं है।नन्दलाल सिंह की आवाज भर्रा जाती है। कहता है कि घबराइए मत, बहुत लोग इंडिया के हैं। जो सबका होगा, वही हमारो होगा। वे दिन में कई बार फोन करते हैं, हाल जानने की कोशिश करते रहते हैं।
मेरा एक ही बेटा है, जब तक वो न आ जाए, चैन नहीं
संतोष की मां कमलावती देवी की आंखें पल-पल भर आती हैं। वे कहती हैं, हमारा एक ही बेटा है। भगवान से मन्नत मांगे हैं कि जैसे गया है वैसे ही सुरक्षित वापस आ जाए।संतोष ने घर बनवाने और बहन की शादी धूमधाम से करने का सपना देखा था। मां कहती हैं, बेटा बोला कि मां, सब ठीक हो जाए, तब हम भी अपनी शादी कर लेंगे।
रंग-गुलाल की जगह डर और दुआएं
बनारपुर में इस बार होली की रौनक कहीं दिखाई नहीं पड़ती। चौपाल पर बैठे बुजुर्ग बताते हैं, होली पर तो हर साल डुगडुगी बजती थी, बच्चे रंग खरीदने जाते थे, लेकिन इस बार गांव में बस चर्चा है युद्ध, मिसाइल, और खाड़ी में फंसे अपने बच्चे।गांव के एक दुकानदार ने बताया, इस साल रंग-गुलाल की बिक्री आधे से भी कम हुई है। लोग कहते हैं कि जब बेटा खतरनाक जगह पर है, तो कैसे खुशी मनाएं?
होली चाहे न मने, बेटा सुरक्षित लौट आए
फोन पर परिवारों को उनके बच्चे कहते जरूर हैं हम सुरक्षित हैं, लेकिन वे भी डर छुपा नहीं पाते।
एक ग्रामीण ने बताया, जो लोग दुबई में हैं, सब बोल रहे हैं कि माहौल टेंस है। मिसाइल गिर रही है। सबको बस यही डर है कि अगला वार कहां होगा।उधर गांव में माताएं सुबह-शाम दीया जला रही हैं। पिता अपने खेत में कम काम कर रहे हैं, घर पर ज्यादा बैठे रहते हैं संभवतः कभी फोन आ जाए।
घर की हालत सुधारने गए थे… अब घरवालों की हालत खराब है
गांव में कई लोग कहते मिले कि अरे भाई, घर की गरीबी मिटाने विदेश जाते हैं। लेकिन अब हाल यह है कि घर वाले ही खाना छोड़ दे रहे हैं।गांव की एक महिला ने कहा, हमको अपने बच्चों की चिंता है। सरकार को देखना चाहिए कि जल्दी से इन सबको वापस बुलाया जाए।
सिर्फ दो परिवार नहीं, पूरा गांव परेशान
बनारपुर छोटा सा गांव है। यहां 100 से 150 घर हैं। किसी का बेटा कुवैत में है, किसी का कतर में, किसी का दुबई में। बुधवार की सुबह गांव में एक जगह 20 से 25 लोग इकट्ठा होकर मोबाइल में खाड़ी देशों की खबरें देख रहे थे। हर मिसाइल हमले की खबर पर डर की लहर दौड़ती।एक बुजुर्ग बोले, युद्ध में कोई भी सुरक्षित नहीं। बस भगवान करे कि हमारे बच्चे सकुशल लौट आएं।
हालात सामान्य हैं, पर गांव माने कैसे?
सुजीत और संतोष ने वीडियो कॉल पर परिजनों को बताया कि यहां सामान्य स्थिति है, हम कैंप के भीतर सुरक्षित हैं। लेकिन यह आश्वासन भी गांव की बेचैनी कम नहीं कर पा रहा।सुजीत की मां कहती हैं, बेटा हमको दिलासा दे रहा है लेकिन उसकी आवाज में भी डर महसूस होता है।
होली पर घर की दहलीज खाली
सुजीत की मां ने कहा,होली तो हर साल आती है। लेकिन बेटा, वो अगर एक बार खो जाए ते वापस नहीं आएगा। बस ईश्वर से दुआ है कि मेरा बच्चा सुरक्षित लौट आए।संतोष की मां ने धीमी आवाज में कहा, हमको होली नहीं चाहिए… बस मेरा बेटा बच जाए.बनारपुर की होली इस बार रंगों से ज्यादा उम्मीद, दुआ और इंतजार से भरी है। पूरा गांव एक ही बात कह रहा है,ईश्वर करे दोनों लड़का सही सलामत वापस आ जाए। बाकी त्योहार बाद में मना लेंगे।
न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।
