भरत का चरित सुनने से हृदय के सभी कलुष मिट जाते हैं : गुप्तेश्वर जी महराज
बेगूसराय.चेरियाबरिया.भगवान का दिव्य विवाह संपन्न हुआ। भगवान की प्रिया जगत जननी माता सीता विवाह के बाद अयोध्या आयी हैं। किसी नें ऐसा सोचा भी नहीं था कि अयोध्या पर इतनी बड़ी विपत्ति भी आ सकती हैं। ऐसे तो भगवान का जन्म ही संतों और देवताओं के संकट को हरने के लिए हुआ है। ये बातें आकोपुर श्री भैरव स्थान परिसर में मंगलवार को अखंड नवाह रामनाम संकीर्तन के बीच नौ दिवसीय श्री राम कथा महायज्ञ के आठवें दिन की कथा आरंभ करते हुए कही। उन्होंने आगे कहा कि समय बीतता चला गया।
राजा दशरथ भी बूढे हो रहे। गुरु से परामर्श लिया और अयोध्या की जनता का भी समर्थन प्राप्त था कि अब राम का राज्याभिषेक किया जाय। सबसे अधिक माता कैकेयी भी यही चाहती थी। लेकिन भगवानों के कार्य पूरे होने वाला था सो भगवती सरस्वती मंथरा की जिह्वा पर बैठ गई। रानी को सिखाया कि युद्ध के दौरान राजा से मिले वरदान में अपने पुत्र भरत के लिए राज मांग लो। संगति के प्रभाव से रानी नें ऐसा ही मांग लिया। रानी कोप भवन में चली गई। राजा नें कहा क्या चाहिए माँगों। रानी नें राम की सौगंध लेकर पहला वरदान मांगा कि राम के बदले भरत को राजा बनाओ।
भगवान केवट की नाव से गंगा पार चले गये भगवान केवट की नाव से गंगा पार चले गये। दशरथ जी को श्रवण कुमार की मृत्यु की याद आती है जब उन्हें शाप मिला था कि पुत्र के वियोग में ही उनकी भी मौत होगी। दशरथ जी के प्राण छूट गये। जिसके राज्यारोहण की पूरी तैयारी हो गई है और पिता नें रानी के वचन पर उसे वनवास दे दिया। उनके वचन का पालन करने राम वनवास को निकल गये।
धर्म ही राम में मूर्तिमान हो गया और मूर्तिमान प्रेम ही भरत हैं। भरत का चरित जो सुनेगा उसके हृदय का कलुष मिटता है और भगवान राम के चरणों में प्रीति होती है। दूसरा लाभ यह है कि संसार के आकर्षण से वैराग्य हो जाता है। गुरु वशिष्ट आते हैं तो संदेशवाहक को भरत और शत्रुघ्न जो अपने ननिहाल में हैं उन्हें बुलाने भेजा। भरत का चरित अकथनीय है। जब चित्त में सत्व का प्रवेश होगा तभी कोई इसे समझ सकता है।
न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।
