चार हजार वर्षों से आस्था का केंद्र है समस्तीपुर के बाबा जागेश्वरनाथ महादेव स्थान
समस्तीपुर.जिला मुख्यालय से लगभग दस किलोमीटर पूर्व, समस्तीपुर-रोसड़ा पथ पर बसा केवस जागीर गांव,जहां आस्था, इतिहास और लोककथाएं एक-दूसरे में घुलकर एक अद्भुत पर्यटन स्थल का रूप ले लेती हैं। यहीं विराजमान हैं सर्व मनोकामना स्वयंभू शिवलिंग बाबा जागेश्वरनाथ महादेव, जिनकी ख्याति सदियों से श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींचती रही है। पर्यटन दिवस के अवसर पर यह स्थल न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पर्यटन की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इसे पर्यटन स्थल का दर्जा मिले तो विकास के नए आयाम स्थापित होंगे।लोकमान्यता के अनुसार बाबा जागेश्वरनाथ महादेव का प्राकट्य लगभग चार हजार वर्ष पूर्व हुआ था। कहा जाता है कि जागवली नामक ऋषि ने यहां वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर महादेव स्वयंभू रूप में प्रकट हुए। इन्हीं ऋषि के नाम पर इस शिवलिंग का नामकरण हुआ। मान्यता है कि यहां मांगी गई कोई भी सच्ची मनोकामना खाली नहीं जाती।शायद यही कारण है कि महाशिवरात्रि पर समस्तीपुर,दरभंगा, सहरसा, खगड़िया, मुंगेर, बेगूसराय, मधुबनी और भागलपुर तक से श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए उमड़ पड़ते हैं।
आस्था, इतिहास और लोकसंस्कृति का यह संगम केवस जागीर का बाबा जागेश्वरनाथ महादेव मंदिर निस्संदेह हर श्रद्धालु और पर्यटक के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव है। इस मंदिर की महत्ता तब और बढ़ जाती है जब हम बाबा अंकलेश्वरनाथ महादेव की कथा से रूबरू होते हैं। करीब 500 वर्ष पूर्व खुदाई के दौरान यहां काले पत्थर से निर्मित बारह फीट ऊंचा शिवलिंग, भगवान गणेश सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियां प्राप्त हुई थीं। यह शिवलिंग आकार में सोमनाथ महादेव से मिलता-जुलता बताया जाता है। आज भक्त एक साथ बाबा जागेश्वरनाथ और बाबा अंकलेश्वरनाथ दोनों शिवलिंगों पर जलाभिषेक कर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।
मेला, मुढ़ी, तेजपत्ता और पर्यटन की अपार संभावनाएं महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां एक महीने तक भव्य मेला लगता है। भागलपुर की प्रसिद्ध मुढ़ी, तेजपत्ता और लकड़ी के फर्नीचर इस मेले की खास पहचान हैं। श्रद्धालु इन वस्तुओं को प्रसाद और स्मृति-चिह्न के रूप में जरूर खरीदते हैं। पर्यटन की दृष्टि से यह स्थल धार्मिक पर्यटन, ग्रामीण हाट-बाजार और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम प्रस्तुत करता है। यदि इसे योजनाबद्ध ढंग से विकसित किया जाए, तो बाबा जागेश्वरनाथ महादेव धाम उत्तर बिहार के प्रमुख पर्यटन मानचित्र पर चमकता सितारा बन सकता है।
ऋषियों की सिद्धि भूमि और ऐतिहासिक संघर्ष यह स्थल प्राचीन काल से याज्ञवल्क्य और भृगु जैसे महान ऋषियों द्वारा सेवित रहा है और सिद्ध पीठ के रूप में विख्यात था। पाल वंश के नारायण पाल के समय यह क्षेत्र आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रहा। किंतु 1199 ईस्वी में खिलजी वंश के शासनकाल में इस पवित्र स्थल को ध्वस्त कर दिया गया। देवी-देवताओं की मूर्तियां तोड़ी गईं और यह स्थान घने जंगल में तब्दील हो गया। आज भी खुदाई में उनके अवशेष मिलना इतिहास की गवाही देता है।
न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।
