सिमरिया घाट पर 42 दिनों तक कल्पवास मेला:गंगा किनारे झोपड़ी बनाकर रहेंगे 50 हजार लोग
बेगूसराय.बिहार का आध्यात्म एवं मोक्षधाम तथा मिथिला के दक्षिणी प्रवेश द्वार बेगूसराय के सिमरिया में पावन गंगा तट पर एशिया प्रसिद्ध कार्तिक कल्पवास मेला लग गया है। कल्पवास करने के लिए पिछले आठ दिनों से देश के विभिन्न हिस्सों से साधु-संतों का आना जारी है। आज से लेकर अगले 42 दिन से अधिक समय तक श्रद्धालु गंगा स्नान के साथ श्रीमदभागवत, कार्तिक मास महात्म्य, रामायण पाठ और मिथिला महात्म्य आदि का श्रवण कर भक्ति में लीन रहेंगे।
कल्पवास के दौरान कार्तिक महात्म्य और भागवत कथा के साथ स्वामी चिदात्मन जी के नेतृत्व में आज आदि कवि महर्षि वाल्मीकि जयंती से 42 दिनों तक चलने वाले कल्पवास की शुरुआत हो गई है। 17 अक्टूबर को रंभा एकादशी के दिन चिदात्मन जी के नेतृत्व में मेला क्षेत्र की पहली परिक्रमा, 19 अक्टूबर को यमदीप दान, 25 अक्टूबर को नहाय खाय के दिन मेला क्षेत्र की दूसरी परिक्रमा, 30 अक्टूबर को अक्षय नवमी और 3 नवंबर को तृतीय परिक्रमा होगी।
कहा जाता है कि मिथिला एवं मगध के संगम स्थली गंगा तट सिमरिया में सदियों से कार्तिक मास में कल्पवास करने की परंपरा रही है। यहां सिर्फ मिथिलांचल ही नहीं, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, भूटान और नेपाल के 50 हजार लोग पर्ण कुटीर बनाकर कल्पवास करते हैं। इसके साथ ही 200 से अधिक खालसा लगाया जाता है।
आदिकाल से ही सिमरिया गंगा तट पर कल्पवास की मान्यता
कहा जाता है कि सिमरिया गंगा तट पर आदिकाल से कल्पवास की परंपरा रही है। हिंदू धर्म शास्त्र में गंगा का काफी महत्व है तथा सिमरिया में गंगा उत्तर से पूरब वाहिनी होती है। राजा परीक्षित को भी श्राप से उद्धार के लिए सिमरिया गंगा तट पर कल्पवास करना पड़ा था। जनक नंदिनी सीता जब विवाह के बाद अपने ससुराल अयोध्या जा रही थी तो उनके पांव पखारने के लिए राजा जनक ने मिथिला की सीमा सिमरिया में ही डोली रखने को कहा था।
तब राजा जनक ने सिमरिया पहुंचकर गंगा के किनारे यज्ञ और कार्तिक मास में कल्पवास किया था, तभी से यहां कल्पवास की परंपरा चल रही है। इस जगह के प्रसिद्धि का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आजादी के बाद देश में गंगा नदी पर सबसे पहला पुल यहां बनाया गया। स्वामी चिदात्मन जी ने कहते हैं कि देश भर में तीन जगह अनादि काल से ही कल्पवास की परंपरा चली आ रही है।
डीएम और एसपी बोले- कल्पवासियों को किसी तरह की असुविधा नहीं होगी
इसमें हरिद्वार में बैशाख माह में, प्रयागराज में माघ माह तथा आदि कुंभ स्थली सिमरिया धाम में कार्तिक माह में कल्पवास के आयोजन की परंपरा है। देश, काल और समय की परिस्थिति का ख्याल रखना हमारी परंपरा रही है। परंपराओं का पालन करते हुए कल्पवास के पौराणिक तथा आध्यात्मिक परंपरा का पालन करना चाहिए। डीएम तुषार सिंगला एवं एसपी मनीष ने बताया कि श्रद्धालुओं को किसी भी प्रकार की असुविधा होने नहीं दी जाएगी। साफ-सफाई, प्रकाश के साथ शौचालय, सुरक्षा, व्यवस्थित घाट तैयार है।
मधुबनी से आए महंत कृष्णचंद्र दास ने बताया-
1982 से यहां खालसा लगाते आ रहे हैं। उस समय सिर्फ छह खालसा लगता था, आज रजिस्टर्ड खालसा की संख्या 120 हो गई है। सिमरिया मिथिला की सीमा है जहां साक्षात मां गंगा विराजमान हैं। महाराजा सगर के 60 हजार संतान थे जो संत के श्राप से जलकर भस्म हो गए थे। भागीरथ के तप से गंगा आई और उसका जल लगा तो उद्धार हो गया। जो श्रद्धापूर्वक स्नान करेंगे उनका उद्धार हो जाएगा।
गोविंद जीव सेवा संस्थान के आचार्य राघवेंद्र राघव ने बताया-
30 वर्ष से यहां हमारा खालसा लगता आ रहा है। जब 6-7 वर्ष उम्र थी, तभी से यहां प्रत्येक वर्ष आ रहे हैं। सिमरिया में त्रिभुवन तारणी मां गंगा है। यहां आकर पूर्व वाहिनी हो जाती है और सूर्य को अर्ध्य देते हुए दिखती है। सूर्य जब तुला राशि में स्थित हो तो गंगा तट पर प्रवास करने का बहुत अधिक महत्व है।
अलग-अलग महीने में अलग-अलग जगहों पर कल्पवास करने का महत्व है। कार्तिक में जब सूर्य तुला में रहते हैं तो गंगा स्नान करने का अधिक महत्व है। सिमरिया पुण्य भूमि है, यह मिथिला के राजा विदेह जनक और जानकी भी तपस्थली रहा है। इस परंपरा से हम लोग कार्तिक महीने में कल्पवास करते हैं जो आदिकाल से चला आ रहा है। यह सिद्ध स्थान है और सदियों से लोग यहां आकर एक महीने तक का कल्पवास करते हैं।
अब जानिए, कल्पवास का आध्यात्मिक और साइंटिफिक महत्व
अहिल्या स्थान मधुबनी के मिथिलेश दास उर्फ बौआ हनुमान 40 वर्षों से लगातार यहां आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि सिमरिया कल्पवास इसलिए हुआ के सालों भर हम अपने गृहस्थ जीवन के प्रपंच में लगे रहते हैं। इसलिए एक महीने तक एकांतवास सिमरिया में जाकर कल्पवास करते हैं। यहां भगवान का भजन-कीर्तन करते हैं। कल्पवास का आध्यात्मिक और साइंटिफिक महत्व है। गंगा में स्नान, सात्विक भोजन, सात्विक विचार रहता है, इससे शरीर स्वस्थ रहता है।
मानसिक तनाव दूर होता है, आयु में वृद्धि होती है। माता जगत जननी सीता के समय से राजा जनक के कल्पवास से यहां परंपरा चल रही है। दरभंगा महाराज ने अपना झंडा गाड़कर कल्पवास की पुनरावृत्ति किया था। ख्खरर बाबा ने यहां खालसा लगाकर कल्पवास को बढ़ावा दिया था। आज ढाई सौ संत महात्मा के नेतृत्व में कल्पवास होता है। बिहार ही नहीं, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश भूटान और नेपाल से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
5 और 15 दिन का भी श्रद्धालु कल्पवास करते हैं
कुछ लोग 5 दिन और 15 दिन तो अधिकतर लोग एक महीने तक कल्पवास करते हैं। यहां 230 खालसा लगता है, एक से सवा लाख लोग प्रत्येक दिन कार्तिक महीने में आते हैं।
सिमरिया गंगा घाट को सिमरिया धाम बनाने वाले सर्वमंगला सिद्धाश्रम के संस्थापक स्वामी चिदात्मन जी ने कहा कि सिमरिया मिथिला, मगध और अंग की सीमा है। वैदिक युग से ही इसकी प्रशस्ति रही है। यहां प्रत्येक वर्ष तुला की संक्रांति में देश-देशांतर के पुण्यात्मा वृंद कल्पवास के लिए पधारते हैं। वेदांग ज्योतिष के आधार पर तुला राशि पर सूर्य, चंद्रमा और बृहस्पति के योग से प्रत्येक 12 वर्षों पर महाकुंभ, छह वर्षों पर अर्धकुंभ और प्रत्येक वर्ष कल्पवास की प्रथा वैदिक युग से ही चली आ रही है।
राजा विदेह की समुचित व्यवस्था से यहां का कल्पवास शुरू हुआ। वे स्वयं तो आचारवान थे ही, साथ ही साथ संतों, ब्राह्मणों, वेदों का सम्मान करने वाले सनातन संस्कृति, संस्कार से युक्त थे। जिनके सौजन्य से देश-देशांतर के पुण्यात्मा वृंद भी लाभान्वित होते थे। राजा विदेह के समय में बहुत ही व्यवस्थित चला करता था जो स्वतंत्रता के बाद फिर यह लब्ध प्रतिष्ठित देखा जा रहा है, यहां का समुचित विकास हो रहा है।
न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।
