25 लाख की लागत से मुस्लिम डकोरेटर ने तैयार किया पंडाल,तिरुपति बालाजी मंदिर के अंदर मां दुर्गा का दर्शन
बेगूसराय।कालरात्रि की पूजा के बाद निशा पूजा के साथ ही भगवती मंदिरों का पट श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दिया गया है। पट खुलने के साथ ही दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी है। गांव से शहर तक के प्रतिमा और पंडाल को आकर्षक लुक दिया गया है। ऐसे में बेगूसराय में सबसे भव्य और अद्वितीय नजारा दिखेगा बखरी के एतिहासिक पुरानी दुर्गा मंदिर में।
जहां पंडाल को तिरुपति बालाजी मंदिर के रुप में उतार दिया गया है। भगवती का दर्शन करने आने वाले श्रद्धालु मंदिर में तिरुपति बालाजी मंदिर के प्रारूप में प्रवेश करने के बाद मां दुर्गा का दर्शन कर सकेंगे। मंदिर का प्रारूप इस तरीके से तैयार कर दिया गया है कि हर कोई उसे देखने आ रहा है। पश्चिम बंगाल से आए 20 कारीगरों ने 30 दिन में यह तैयार किया है।
स्पेशल डिजाइन तैयार करने के लिए बाहर से मंगवाया कपड़ा
इसके लिए स्पेशल डिजाइन का तैयार किया गया कपड़ा बाहर से मंगाया गया है। तिरुपति बालाजी मंदिर के डिजाइन का गेट अप बनाने में करीब 25 लाख रुपए खर्च हुए हैं। सबसे बड़ी बात है देश में हिंदू-मुसलमान का बवाल हो रहा है। वहीं बखरी दुर्गा स्थान में तिरुपति मंदिर के प्रारूप का पंडाल मुस्लिम डेकोरेटर के प्रयास से तैयार किया है।सचिव तारानंद सिंह ने बताया कि बखरी के ऐतिहासिक पुरानी दुर्गा मंदिर शक्तिपीठ के मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण चल रहा है। अयोध्या में बने राम मंदिर की तरह नागर शैली टाईप से बनेगा, इसके लिए काम चल रहा है, समय लगेगा। निर्माण के लिए मंदिर टूट जाने के कारण परेशानी होने वाली थी। अच्छा स्वरूप देने के लिए तिरुपति बालाजी मंदिर की तर्ज पर पंडाल बनाने का निर्णय लिया गया।
सिर्फ पूजास्थल नहीं तंत्र साधना का प्रमुख केंद्र
बेगूसराय का पुरानी दुर्गा स्थान बखरी सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि यह तंत्र साधना, त्याग और अटूट आस्था का वह केंद्र है, जिसका इतिहास लगभग 600 वर्ष से भी पुराना है। राजा-महाराजाओं के काल से लेकर आज के आधुनिक युग तक यह शक्तिपीठ भक्तों के लिए एक ऐसी शरणस्थली रहा है, जहां सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है।
मंदिर के इतिहास को लेकर कई किंवदंतियां प्रचलित हैं। माना जाता है कि इस शक्तिपीठ की स्थापना मध्य प्रदेश के धार शहर से आए परमार वंश के राजाओं द्वारा की गई थी। परमार वंश के शासक अपनी कुलदेवी मां दुर्गा की एक अष्टधातु की स्वर्ण प्रतिमा के साथ यात्रा पर थे। राजा गंगा नदी मार्ग से यात्रा कर रहे थे। माता की प्रतिमा को मुंगेर जिले के कष्टहरणी घाट में स्नान के दौरान प्राप्त किया गया था।जब राजा और उनकी सेना बखरी क्षेत्र में पहंची तो उनकी कुलदेवी ने उन्हें यहीं रुककर अपनी शक्ति का केंद्र बनाने का निर्देश दिया। कहा जाता है कि इस मंदिर की स्थापना मुगल काल से भी पहले यानी 14वीं शताब्दी के आसपास हुई होगी। राजा के संकल्प और मां की शक्ति के प्रभाव से यहां बहने वाली कमला नदी ने रास्ता बदल लिया, जिससे मंदिर का निर्माण हो सका।
न्यूज़ टू बिहार में कई सालो में काम करने के साथ,कंटेट राइटर, एडिटिंग का काम कर रही।3 साल का पत्रकारिता में अनुभव।
