“नवरात्र के चौथे दिन ही संपन्न हुई माता कूष्मांडा की पूजा,आज छठे स्वरूप माता कात्यायनी की होगी उपासना
समस्तीपुर.वासंतिक नवरात्रि के चौथे दिन कूष्मांडा और स्कंदमाता की पूजा संपन्न हुई। इस दौरान दूधपुरा चैती दुर्गा मंदिर में भी माता रानी की पूजा और आरती की गई। माता कूष्मांडा से ब्रह्मांड की उत्पत्ति मानी जाती है। इन्हें श्रृष्टि की आदि शक्ति भी कहा जाता है। माता का वासस्थान सूर्य मंडल में होता है। बुधवार को ही स्कंदमाता की भी पूजा हुई।
स्कंदमाता को छ: मुख वाले कार्तिकेय की जननी के रुप में पूजा जाता है। वहीं, मंदिर परसिर में आरती में आर्यन ठाकुर, हरिशंकर ठाकुर, कुंदन तिवारी, चंदन तिवारी, रणवीर ठाकुर, नवीन कुमार सिंह, कृष्ण कमार तिवारी, राममोहन तिवारी, सोनल ठाकुर, मुरारी तिवारी आदि थे। वहीं, आज नवरात्र में मां दुर्गा के छठे रुप कात्यायनी की पूजा होगी। समस्तीपुर के भागवत कथा वाचक पंडित विजयशंकर झा के अनुसार पौराणिक कथा के अनुसार एक वन में कत नामक ऋषि थे।
कत के पुत्र हुये कात्य। ऋषि कात्य को कोई संतान न थी। इनकी मनोकामना हुई कि जगदंबा को ही पुत्री रुप में प्राप्त किया जाय। कात्य ऋषि ने माता दुर्गा को प्रसन्न करने के लिये कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न माता दुर्गा ऋषि के समक्ष प्रकट हुई। स्वयं को ही ऋषि के घर पुत्री रुप में प्रकट करने का आश्वासन दिया। नवरात्र के छठवें दिन माता कात्यायनी कात्य ऋषि के यहां प्रकट हुई। इनका नाम कात्यायनी रखा गया। देवी कात्यायनी की पूजा से शत्रुओं का संहार होता है।
आज ही संध्या काल में विल्वाभिमंत्रण किया जाएगा, कल पधारेंगी भगवती विल्वाभिमंत्रण में षष्ठी तिथि में संध्याकाल भक्त बेल वृक्ष की पूजा करते हैं। उसी वृक्ष की पूजा होती है जिसमें एक ही डंठल में जोड़े में बेल-फल लगा हो। संध्या में बेल वृक्ष की पूजा होती है। उसमें पांच या सात बार वृक्ष को लाल या पीले धागे से लपेटा जाता है। लाल चंदन-सिंदूर लगाकर मंत्र द्वारा वृक्ष से उन बेल फलों को पीले वस्त्र से ढक दिया जाता है।
और अगले दिन सप्तमी तिथि में प्रात:काल पुन: गणेश- अम्बिका की पूजा के बाद वृक्ष की पूजा होती है। और सुंदर ढंग से सजाये हुये डोली में उन फलों को डंठल सहित काट कर लाया जाता है। ये बेल के फल दुर्गा स्वरुप माने जाते हैं। विल्वाभिमंत्रण के साथ माता दुर्गा की विशेष पूजा प्रारंभ हो जाती है। विशेष डोली पर शंख, घंटे आदि की मंगल-ध्वनियों के बीच माता दुर्गा की जयकारे के साथ इन बेल फलों को पूजा स्थान में रखकर सप्तमी, महाष्टमी और महानवमी की पूजा की जाती है।